Saturday, 15 December 2012

''साहित्य के इस दौर में कठिन भाषा में लिखना सरल है''-सत्यनारायण व्यास

संभावना की संगोष्ठी की रिपोर्ट चित्तौड़गढ़ । 

साहित्य के इस दौर में कठिन भाषा में लिखना सरल है पर सरल भाषा में लिखना कठिन है, आमजन मानस में सहजता व सरलता से उतरने वाली भाषा ही कालजयी होती हैं ।

संभावना द्वारा आयोजित एकल कविता पाठ में आलोंचक व कवि डा. सत्यनारायण व्यास ने अपनी कविताओं के पाठ की शुरुआत में कहा कि संघर्ष से कविता बनती है और वही आदमी को विपरित परिस्थितियों मे जिन्दा रखती है। सारा जीवन पढ़ते-पढ़ाते गुज़र गया और यही ज़रूरी बात जान पाया कि हिन्दी का पाठक अगर संस्कृत,राजस्थानी  और उर्दू का भी जानकार हो जाए तो सही मायने में एक अध्येता की भूमिका अदा कर सकता है.वेद,पुराण पढ़े और उनके साथ ही मैंने लोक जीवन को भी असल में अनुभव किया है मैं आखिर में किसी एक को चुनने के मसले पर लोक जीवन चुनुँगा.क्योंकि शास्त्र भी लोक से ही उपजा है.

डॉ. व्यास ने तीन अलग-अलग पडावो के साथ अपनी कविताएँ पढ़ी,नगर के रुचिशील पाठकों के बीच संपन्न इस आयोजन ने नगर में पाठकीयता को फिर से जाग्रत किया है.खुद को कभी भी कवि नहीं मानने वाले डॉ. व्यास ने पहले दौर में संन्यास जैसी दर्शनपरक कविता श्रोताओं को सुनाई.उसी के ठीक बाद डाईट चित्तौड़ के प्राध्यापक डॉ. राजेन्द्र सिंघवी ने उनके कविता संग्रह 'मेरी असमाप्त यात्रा' पर पिछले दौर के तमाम बड़े रचनाकारों की पंक्तियों के उदाहरण देते हुए अपनी समालोचकीय प्रतिक्रया रखी.

दुसरे पडाव पर डॉ. व्यास ने देशज शब्दों से पूरित आमजन जनजीवन के करीब की कविताएँ सुनाई जिसमें उनके आदिवासी  बहुल  क्षेत्र  में बिताएं समय की गंध साफ़ तौर पर अनुभव की गयी.यहीं पाठकों को उन्होंने अपने दूसरे कविता संग्रह 'देह के उजाले में' से भी कुछ महत्वपूर्ण रचनाएं सुनाई.इस बीच डॉ. रेणू व्यास ने एक बेटी के रूप में अपने पिता के साहित्यिक जीवन के समानान्तर रही परिस्थितियों को प्रभावी रूप से सामने रखा,उन्होंने डॉ. व्यास की कविता को जीवन के विभिन्न परिप्रेक्षों में विवेचित किया.


आखिर में डॉ. व्यास ने अपने साठ की उम्र के आसपास की नई और चुनी हुई रचनाएं सुनाई जिन्हें सबसे ज्यादा पसंद किया गया.उन्होंने पाठ का अंत राजनीति और हमारे वर्तमान समाज को केन्द्रित करते मुक्तकों से किया .इस अवसर पर संभावना की मुख पत्रिका 'बनास जन' का लोकार्पण राजस्थानी दोहाकार शिवदान सिंह कारोही और  डॉ. व्यास ने किया ,साथ ही इस अंक में निहित डॉ. माधव हाड़ा के लम्बे आलेख 'मीरा का समाज' पर एम्.एल.डाकोत ने संक्षिप्त टिप्पणी की.आयोजन के सहभागी पहल संस्थान के संयोजक जे.पी.दशोरा और व्याख्याता डॉ.राजेंश चौधरी ने अतिथियों का माल्यार्पण किया.आभार माणिक ने दिया.संगोष्ठी का संचालन डॉ. कनक जैन ने किया वहीं सूत्रधार की भूमिका में संतोष शर्मा,विकास अग्रवाल और अजय सिंह थे.

आयोजन में संभागी-इस संगोष्ठी में नगर के लगभग तमाम साहित्य प्रेमी मौजूद थे.हिन्दी की छात्रा शीतल पुरोहित,स्वतंत्र लेखक नटवर त्रिपाठी,गीतकार रमेश शर्मा,डॉ.रमेश मयंक,नन्द किशोर निर्झर,द्विलाल दमामी,आकाशवाणी उदघोषक अब्दुल सत्तार,डॉ. अखिलेश चाष्टा,शारदा चाष्टा,हेमंत शर्मा,डॉ.विनय शर्मा,एम्.इकराम अजमेरी,संजय कुमार जैन,बाबू खान मंसूरी,डी.के.गर्ग,अश्रलेश कुमार दशोरा,राव नारायण सिंह,डॉ. आरके. दशोरा,डॉ.राजेश चौधरी,चन्द्रकान्ता व्यास,अब्दुल जब्बर,अमृत 'वाणी',आभा मेहता,हरीश लड्ढा,गुणमाला जैन  आदि शामिल थे.

आयोजन के बाकी फोटो यहाँ देखिएगा.

 योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :-
डॉ.कनक जैन

प्रतापगढ़ की आदिवासी तहसील अरनोद के दलोट गाँव  में पले-बढ़े जहां छट्टी कक्षा से ही साहित्यिक पृष्ठभूमि की बाल पत्रिकाओं के चक्कर में आ गए.बाद के सालों में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् जैसे छात्र आन्दोलन में भी अनेक दायित्व निभाएं.कोलेज के ठीक बाद पत्रकारिता में भी हाथ साफ़ किया.

चित्तौडगढ की साहित्यिक संस्था संभावना के सह संयोजक और बनास जन जैसी लघु पत्रिका के प्रबधसम्पादक है.यादवेन्द्र शर्मा 'चन्द्र' के साहित्य और कृतित्व पर शोध किया है.वर्तमान में स्कूल शिक्षा में हिन्दी के प्राध्यापक हैं.

नगर में संचालित ठीक-ठाक विचारों की सामाजिक/सांस्कृतिक संस्थाओं के आयोजनों में आपका आना जाना है.मूल रूप से विज्ञान के छात्र है मगर हिन्दी के नाम से ख़ास पहचान है.मोबाईल--9413641775

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